मैं सभी से रुकने की रिक्वेस्ट करती हूं’: दीक्षा गुलाटी | एक वायरल आरोप और उसके बाद का तूफान

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‘मैं सभी से रुकने की रिक्वेस्ट करती हूं’: दीक्षा गुलाटी, ऑनलाइन ट्रॉलिंग और साइबर हेट का सामना करती एक सामाजिक कार्यकर्ता की अपील


भाग 1: प्रस्तावना – एक वायरल आरोप और उसके बाद का तूफान

भारत की डिजिटल दुनिया में, जहां ट्रेंड चंद सेकंड में बनते और बिगड़ते हैं, वहीं एक आरोप, एक अफवाह, या एक संदर्भहीन वीडियो किसी व्यक्ति के जीवन को पल भर में उथल-पुथल में डाल सकता है। कुछ ऐसा ही हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ता और सामाजिक उद्यमी दीक्षा गुलाटी के साथ हुआ।

एक पुराना वीडियो, जिसमें उन्हें एक प्रतियोगिता के दौरान किसी को नकल करते हुए दिखाया गया था, अचानक से सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, और उन पर ‘चीटिंग’ के गंभीर आरोप लगने लगे। इस आरोप ने उनके खिलाफ एक अभूतपूर्व साइबर हेट कैंपेन का रूप ले लिया, जहां उन्हें न केवल अपमानजनक टिप्पणियों, बल्कि गहन व्यक्तिगत हमलों और धमकियों का सामना करना पड़ा।

इस आग में घी का काम किया विवादों में रहने वाले कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और व्यक्तियों ने, जिन्होंने बिना पूरी जानकारी जाने या संदर्भ समझे, इस वीडियो को और हवा दे दी। ऐसे में, दीक्षा गुलाटी ने, जो आमतौर पर पर्यावरण, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर अपनी आवाज उठाती हैं,

एक संयमित और दिल छू लेने वाला वीडियो जारी करते हुए सभी से इस ऑनलाइन नफरत को रोकने की गुहार लगाई। उनके शब्द साधारण थे लेकिन गहरा प्रभाव छोड़ने वाले: “मैं सभी से रुकने की रिक्वेस्ट करती हूं।”

यह लेख केवल एक वायरल हुई घटना का ब्यौरा ही नहीं देगा, बल्कि इसके हर पहलू – दीक्षा गुलाटी कौन हैं, वह वीडियो क्या था, आरोप क्या थे, उनकी प्रतिक्रिया क्या रही, ऑनलाइन हेट का स्वरूप कैसा था, और इस पूरी घटना से

हमें साइबर मॉबिंग, नैतिक पुलिसिंग, और सोशल मीडिया की जिम्मेदारी के बारे में क्या सीख मिलती है – का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करेगा। हमारा उद्देश्य घटना की सतह को नहीं, बल्कि उसकी गहराई में छिपे सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पैटर्न को समझना है।


भाग 2: दीक्षा गुलाटी कौन हैं? एक सामाजिक पहचान का परिचय

दीक्षा गुलाटी कोई रातों-रात चर्चा में आई सेलेब्रिटी नहीं हैं। वह एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने सामाजिक बदलाव के क्षेत्र में कई वर्षों से काम करके अपनी पहचान बनाई है।

  • शैक्षणिक पृष्ठभूमि: दीक्षा ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है, जहां उन्होंने इंजीनियरिंग और सामाजिक विज्ञान के संयोजन पर ध्यान दिया। उनकी शैक्षणिक रुचि हमेशा से सामाजिक प्रभाव और नवाचार के इर्द-गिर्द रही है।
  • सामाजिक उद्यमिता: वह ‘हैप्पी हेल्प्स’ नामक एक सामाजिक संस्था की संस्थापक हैं, जो शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास पर केंद्रित है। उनकी संस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में लाइब्रेरी बनाने, स्वच्छता अभियान चलाने और युवाओं को सशक्त बनाने जैसे कई प्रोजेक्ट्स चलाए हैं।
  • सार्वजनिक वक्ता और विचारक: दीक्षा टेड-एक्स जैसे मंचों पर बोल चुकी हैं और अक्सर युवा नेतृत्व, सामाजिक जिम्मेदारी और लैंगिक समानता जैसे विषयों पर अपने विचार साझा करती रहती हैं।
  • सोशल मीडिया उपस्थिति: इंस्टाग्राम और लिंक्डइन जैसे प्लेटफॉर्म्स पर उनकी मौजूदगी प्रेरणादायक सामग्री और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा से भरी रहती है। उनके फॉलोवर्स मुख्यतः युवा, शिक्षित वर्ग है जो सकारात्मक बदलाव में रुचि रखता है।

इस पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है, क्योंकि यह दिखाता है कि वह किस तरह की शख्सियत हैं – एक ऐसी व्यक्ति जिसकी पहचान ईमानदारी, परिश्रम और सामाजिक योगदान से जुड़ी है। इसीलिए ‘चीटिंग’ जैसे आरोप उनकी पहचान के मूल के विपरीत लगते हैं और शायद इसीलिए उन्होंने इतनी तीखी प्रतिक्रिया दी।


भाग 3: वह वायरल वीडियो और आरोपों की पड़ताल – क्या था पूरा संदर्भ?

घटना की जड़ में एक वीडियो है जो कई साल पुराना है। आइए, इसके हर पहलू को समझने की कोशिश करते हैं।

  • वीडियो की प्रकृति: यह वीडियो एक टीवी रियलिटी शो या प्रतियोगिता के सेट से लगता है। दीक्षा को इसमें एक क्विज़ या प्रश्नोत्तरी राउंड में भाग लेते हुए दिखाया गया है। वह अपने साथी प्रतिभागियों के साथ बैठी हैं।
  • विवादास्पद क्षण: वीडियो के एक हिस्से में, ऐसा प्रतीत होता है कि दीक्षा अपने पड़ोस में बैठे किसी अन्य प्रतिभागी के पेपर या स्क्रीन की ओर देख रही हैं। यह ‘देखना’ ही पूरे विवाद का केंद्र बना।
  • आरोपों का सार: सोशल मीडिया यूजर्स, विशेष रूप से कुछ इन्फ्लुएंसर्स ने, इस क्लिप को काट-छांटकर पेश किया और आरोप लगाया कि दीक्षा गुलाटी ‘नकल कर रही थीं’ या ‘चीटिंग’ कर रही थीं। इन आरोपों को ऐसे पेश किया गया मानो यह किसी शैक्षणिक परीक्षा या कोई राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा में धोखाधड़ी का मामला हो।
  • संदर्भ का अभाव: यहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि वायरल क्लिप में पूरा संदर्भ नहीं है। क्या यह शो का एक फन सेगमेंट था? क्या नियमों के तहत एक-दूसरे से चर्चा करने की अनुमति थी? क्या यह एक गेम शो का हिस्सा था जहां ऐसी गतिविधियों को ‘स्ट्रैटजी’ माना जाता है? वीडियो में इन सवालों के जवाब नहीं मिलते। बिना संदर्भ के, केवल एक क्लिप के आधार पर किसी के चरित्र पर लगाया गया यह आरोप, ‘ट्रायल बाई सोशल मीडिया’ का एक उत्कृष्ट उदाहरण बन गया।

इस तरह की आउट-ऑफ-कॉन्टेक्स्ट वीडियोज़ का वायरल होना आज के डिजिटल युग में एक आम रणनीति बन गई है, जिसका उद्देश्य अक्सर किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना होता है।


भाग 4: दीक्षा गुलाटी की प्रतिक्रिया – संयम, स्पष्टीकरण और मानवीय अपील

अपने खिलाफ बढ़ते हमलों और नफरत के बीच, दीक्षा ने एक वीडियो रिकॉर्ड करके अपनी बात रखी। उनकी इस प्रतिक्रिया को कई स्तरों पर देखा जा सकता है:

  1. भावनात्मक पारदर्शिता: वीडियो की शुरुआत में ही वह भावुक नजर आती हैं। वह कहती हैं कि यह हमला उनके लिए, उनके परिवार के लिए और उनकी टीम के लिए बेहद दुखद और कठिन रहा है। यह पारदर्शिता उन्हें एक ‘बचाव करने वाले’ के बजाय एक ‘इंसान’ के रूप में सामने लाती है।
  2. संदर्भ का स्पष्टीकरण: वह बताती हैं कि यह वीडियो एक ‘फन कॉम्पिटिशन’ का है, जहां ऐसी गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाता था। उन्होंने यह नहीं कहा कि उन्होंने ऐसा नहीं किया, बल्कि उस कार्य के पीछे के नियमों और संदर्भ को समझाने की कोशिश की। उनका तर्क है कि उस सेटिंग में जो हुआ, वह ‘चीटिंग’ की परिभाषा में नहीं आता।
  3. नफरत के प्रभाव पर प्रकाश: दीक्षा ने सीधे तौर पर उस साइबर हेट और बदमाशी का जिक्र किया जो उनके खिलाफ चल रही थी। उन्होंने बताया कि कैसे लोगों ने उनके परिवार, उनकी शिक्षा और उनके काम पर हमला करना शुरू कर दिया। यह सिर्फ एक आरोप पर चर्चा नहीं थी, बल्कि उस आरोप के बाद हुए साइबर हिंसा के प्रभाव को उजागर करना था।
  4. केन्द्रीय अपील – “मैं सभी से रुकने की रिक्वेस्ट करती हूं”: यह वाक्य उनकी पूरी अपील का सार है। यह एक कमजोर नहीं, बल्कि एक सशक्त और मानवीय अनुरोध है। वह लड़ाई नहीं, बल्कि शांति और रुकने का आग्रह कर रही हैं। यह नफरत के चक्र को तोड़ने की एक कोशिश है।
  5. बड़े सवाल उठाना: अपने वीडियो के अंत में, वह दर्शकों से पूछती हैं कि क्या हम इस तरह की संस्कृति को बढ़ावा देना चाहते हैं, जहां बिना जाने लोगों को निशाना बनाया जाए? क्या यही हमारा समाज बनना चाहिए?

उनकी यह प्रतिक्रिया आक्रामक बचाव या पलटवार न होकर, एक सभ्य, तर्कसंगत और भावनात्मक रूप से परिपक्व प्रतिक्रिया थी।


भाग 5: ऑनलाइन हेट का स्वरूप – ट्रोल्स, मॉब मेंटलिटी और सेलेब्रिटी इन्फ्लुएंसर्स की भूमिका

दीक्षा गुलाटी के खिलाफ चले हेट कैंपेन ने ऑनलाइन दुर्व्यवहार के कई पहलुओं को उजागर किया:

  • ट्रॉलिंग और अपमानजनक भाषा: उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स के कमेंट सेक्शन में व्यक्तिगत अपमान, गालियां और अश्लील टिप्पणियों की बाढ़ आ गई। उनकी उपस्थिति, उनकी आवाज, उनके काम – सब कुछ निशाने पर था।
  • मानसिक स्वास्थ्य पर हमला: कई टिप्पणियों में उन्हें ‘मेंटली अनस्टेबल’ या ‘साइको’ जैसे शब्दों से लेबल किया गया, जो मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज की कलंकित मानसिकता को दर्शाता है।
  • परिवार को निशाना बनाना: ऑनलाइन हेट केवल दीक्षा तक सीमित नहीं रही। उनके परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से उनकी मां के बारे में भी आपत्तिजनक और अपमानजनक बातें की गईं।
  • प्रोफेशनल कार्य को कमतर आंकना: कई लोगों ने उनके सामाजिक कार्यों पर सवाल उठाए, उन्हें ‘ढोंग’ या ‘पब्लिसिटी स्टंट’ बताया। यह उनकी पहचान के मूल को ही खारिज करने की कोशिश थी।
  • सेलेब्रिटी इन्फ्लुएंसर्स की भूमिका: कुछ बड़े इन्फ्लुएंसर्स और यूट्यूबर्स ने इस वीडियो पर ‘रिएक्शन’ वीडियोस बनाईं या अपने प्लेटफॉर्म से इसे शेयर किया, अक्सर संदर्भ को नजरअंदाज करते हुए या मजाक बनाते हुए। उनकी विशाल फॉलोइंग ने इस हेट को एक ऑनलाइन मॉब में बदल दिया। उनकी इस कार्रवाई पर सवाल उठता है कि क्या उन्हें अधिक जिम्मेदारी से कंटेंट शेयर करना चाहिए था?
  • मेम्स और डीपफेक्स का इस्तेमाल: वीडियो को मेम्स बनाकर और कभी-कभी विकृत करके (डीपफेक या एडिट करके) सोशल मीडिया पर फैलाया गया, जिससे आरोप और भी भड़काऊ बन गए।

यह पैटर्न नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में, स्नेहा दिल्लन, राश्मि समद्दर, और कई अन्य महिलाओं को ऐसे ही साइबर हमलों का सामना करना पड़ा है।


भाग 6: बड़े सवाल – सोशल मीडिया, मॉरल पुलिसिंग और डिजिटल नागरिकता

दीक्षा गुलाटी की यह घटना केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है; यह हमारे डिजिटल समाज की कई गंभीर बीमारियों को दर्शाती है।

  1. ट्रायल बाई सोशल मीडिया: क्या बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया, सबूतों की पूरी जांच, या दोनों पक्षों को सुनने के मौके दिए, सोशल मीडिया पर किसी का मुकदमा चलाना और सजा सुना देना उचित है? यह तानाशाही की एक नई डिजिटल रूप है।
  2. आउट-ऑफ-कॉन्टेक्स्ट कल्चर: सोशल मीडिया पर अक्सर वीडियो या बयानों के अंश बिना संदर्भ के वायरल होते हैं। यह संदर्भ का अभाव गलतफहमी और नफरत को जन्म देता है। क्या हमें हर वायरल कंटेंट को शक की नजर से देखना शुरू कर देना चाहिए?
  3. ऑनलाइन मॉब मेंटलिटी: कैसे एक व्यक्ति की टिप्पणी हजारों लोगों के हमले में बदल जाती है? यह ‘हर्ड मेंटलिटी’ या ‘डिजिटल मॉबिंग’ का खतरनाक रूप है, जहां व्यक्तिगत जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है और लोग सामूहिक नफरत में शामिल हो जाते हैं।
  4. इन्फ्लुएंसर्स की नैतिक जिम्मेदारी: जिनके लाखों फॉलोवर्स हैं, उनकी जिम्मेदारी क्या है? क्या उन्हें बिना पूरी तस्वीर जाने, संवेदनशील मामलों पर टिप्पणी करने या कंटेंट शेयर करने से बचना चाहिए? क्या वे ‘क्लिकबेट’ और ‘एंगेजमेंट’ के चक्कर में सामाजिक हिंसा को हवा दे रहे हैं?
  5. लैंगिक पहलू: क्या एक महिला सार्वजनिक व्यक्ति के खिलाफ ऑनलाइन हेट अक्सर अधिक व्यक्तिगत, अधिक आक्रामक और अधिक अपमानजनक होती है? क्या समाज महिलाओं के चरित्र और नैतिकता को उसी कठोरता से जांचता है जिस कठोरता से पुरुषों के साथ करता है?
  6. मानसिक स्वास्थ्य प्रभाव: इस तरह के साइबर हमले का पीड़ित की मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है? चिंता, अवसाद, और आत्महत्या के विचार तक इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। दीक्षा ने स्वयं इस मानसिक पीड़ा का जिक्र किया।

भाग 7: कानूनी परिप्रेक्ष्य और निवारक उपाय

भारत में साइबर हेट और ऑनलाइन उत्पीड़न से निपटने के लिए कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन चुनौतियां भी हैं।

  • प्रासंगिक कानून:
    • भारतीय दंड संहिता (IPC): धारा 499 (मानहानि), धारा 507 (गुमनाम धमकी), धारा 509 (शब्द या इशारे से किसी स्त्री की लज्जा भंग करना)।
    • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act): धारा 66A (हालांकि अब रद्द), धारा 67 (अश्लील सामग्री प्रसारित करना), और धारा 66E (प्राइवेसी का उल्लंघन)।
    • आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013: ऑनलाइन उत्पीड़न से जुड़े प्रावधान।
  • चुनौतियां: ऑनलाइन दुर्व्यवहार करने वालों की पहचान करना, उन पर मुकदमा चलाना, और तेजी से न्याय दिलाना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है। अक्सर पीड़ित कानूनी लड़ाई की मानसिक और आर्थिक लागत उठाने से हिचकिचाते हैं।
  • निवारक उपाय क्या हो सकते हैं?
    • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही: प्लेटफॉर्म्स को हेट स्पीच और हरासमेंट को पहचानने और हटाने के लिए अधिक प्रभावी एल्गोरिदम और मैनुअल रिव्यू सिस्टम विकसित करने होंगे।
    • डिजिटल साक्षरता: नागरिकों, विशेषकर युवाओं को डिजिटल साक्षरता के बारे में शिक्षित करना जरूरी है। इसका मतलब है कि सोर्स को वेरीफाई करना, संदर्भ को समझना, और ऑनलाइन बातचीत में सम्मान बनाए रखना।
    • सहानुभूति और दयालुता का प्रसार: ‘डोंट फीड द ट्रोल्स’ के सिद्धांत को अपनाना। हेटफुल कंटेंट को इंटरेक्ट करने या शेयर करने के बजाय, सकारात्मक और रचनात्मक बातचीत को बढ़ावा देना।
    • सहायता प्रणाली: पीड़ितों के लिए मानसिक स्वास्थ्य सहायता और कानूनी सलाह की उपलब्धता सुनिश्चित करना।

भाग 8: निष्कर्ष – ‘रुकने’ का आह्वान और एक बेहतर इंटरनेट की खोज

दीक्षा गुलाटी का साधारण सा वाक्य – “मैं सभी से रुकने की रिक्वेस्ट करती हूं” – वास्तव में आज के डिजिटल युग के लिए एक गहरा संदेश है। यह केवल उनके खिलाफ चल रहे हेट कैंपेन को रोकने की अपील नहीं है; यह हम सभी से एक विराम लेने, सोचने, और अपने ऑनलाइन व्यवहार पर पुनर्विचार करने का आह्वान है।

क्या हम उस संस्कृति का हिस्सा बनना चाहते हैं जहां एक छोटी सी क्लिप किसी व्यक्ति के जीवनभर के काम पर पानी फेर दे? क्या हम उस न्यायधीश की भूमिका निभाना चाहते हैं जिसके पास न तो सभी तथ्य हैं और न ही संदर्भ? क्या हमारे कीबोर्ड से निकले शब्द किसी की मानसिक शांति छीन सकते हैं, इसकी हमें परवाह नहीं होनी चाहिए?

दीक्षा गुलाटी की यह घटना एक चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि इंटरनेट की दुनिया वास्तविक दुनिया से अलग नहीं है। यहां के शब्दों का असर वास्तविक जीवन में होता है, वास्तविक दर्द देता है। अगर हम एक स्वस्थ डिजिटल लोकतंत्र चाहते हैं, तो हमें जिम्मेदार डिजिटल नागरिक बनना होगा।

हमें सत्य की जांच करनी होगी, संदर्भ को समझना होगा, भावनाओं से अधिक तर्क को महत्व देना होगा, और सबसे बढ़कर, एक दूसरे के प्रति मानवीय दया और सम्मान बनाए रखना होगा।

दीक्षा का ‘रुक जाना’ सिर्फ एक विराम नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का संकेत हो सकता है – एक ऐसी शुरुआत जहां हम बिना सोचे-समझे शेयर करने, नफरत फैलाने और दूसरों का मनोरंजन करने के लिए उनका मजाक उड़ाने के बजाय, समझदारी, सहानुभूति और जिम्मेदारी से ऑनलाइन जुड़ें। क्योंकि अंततः, इंटरनेट हमारा प्रतिबिंब है। अगर हम उसे बेहतर बनाना चाहते हैं, तो पहले खुद को बेहतर बनाना होगा।

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